मैंने पानी पर एक नाव रखी
नाव में खुशियां थी
बहुत सारी दुआएं और विश्वास था
धीर धीरे उसमे पानी भर गया
पानी, बहुत सारा पानी…
देख कर लगा जैसे धोखा हुआ
तूफ़ान भी ज़ोर का साथी था
एक तेज़ हवा का झोंका
और बहुत सा धोखा… जैसे नाव पी गया हो…
पानी बहुत सारा होता है…
धोखा भी बहुत सारा होता है …
जितना पानी, उतना धोखा…
अब नाव डूब रही है, मैं गल रहा हूँ…
पर पानी का धोखा अब समझ नहीं आता…
ये उखड़ता रिश्ता मेरा उससे अब मुझे दूर ही रखे…
-यशराज