शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

तेरे लिए हर कविता अधूरी है

बहुत दिन हो गए तेरे पास बैठ कर तुझसे बातों किये। हमेशा काम की जल्दी में टाल देता हूँ तेरी बातों को...और तेरे बस एक ही सवाल का जवाब दे देता हूँ कि हाँ मैंने खाना खा लिया। कभी कभी सोचता हूँ कि पूरे दिन में तू मुझे कितने नि:स्वार्थ भान से याद करती है और मैं कितने स्वार्थ के साथ तुझे याद करता हूँ। तेरा वात्सल्य मैंने हमेशा जल्दी में भुलाया है। कई बार तू कुछ कहते कहते रह जाती और मैं फोन काट देता। फिर अचानक जब थोड़ा अटपटा सा लगता है तो खोजता हूँ खुद को, पाता हूँ कि तू मेरे अंदर है... माँ मैं तुम हूँ। मेरे शब्दों के, मेरी सांस के, मेरे नज़रिये के, मेरी सोच के पीछे तू है। सब कुछ तेरा दिया है। करवट नहीं लेती थी तू ताकि मेरी नींद ना खुल जाए...ये सब याद आजाता है। पर इस दौड़-धूप में फिर से घुल सा जाता है।तेरे लिए मैं आज भी वही हूँ वैसा ही हूँ...कभी ये सोचता हूँ कि ये तो अच्छा है, एक मदर्स डे है तो कम से कम ज़िक्र होता है तेरा, और कभी ये सोचता हूँ क्या एक ही दिन है जो तेरे लिए दूँ। बहुत दिन हो गए तेरे पास बैठ कर तुझसे बातें किए। तू पेड़ है मेरा, एक एेसा पेड़ जिसने मुझे सींचा है। तेरा बख़ान कितना भी हो कम है।
बहुत दिन हो गए तेरे पास बैठ कर तुझसे बातें किए।


तुम...भाव ही भाव हो तुम,
हर अभाव की पूर्ति हो।
वात्सल्य का बादल हो।
आशा हो।।
मुझे एक पेड़ ने सींचा है।
तुम वो पेड़ हो।।
माँ मेरे शब्दों का भार तुम हो
क्षितिज हो मेरा तुम संसार हो।
कविता हो मेरी
माँ तुम सार हो।
माँ तुम मेरा विस्तार हो।।
तेरी डांट लय है
तेरे बिन भय है
तू अमय है।
अमृत है,।।
माँ तू गान है...
ये संसार तेरा बख़ान है।।
तेरे लिए बनी हर कविता अधूरी है...
तू सिर्फ मेरे भाव में पूरी है।।
-यशराज
#yashraj
#mothersday
#maa

तेरे लिए हर कविता अधूरी है

एक तुम थी


मैंने अपनी उँगलियों पर दो पुतले चितरे...चितरते वक़्त मेरे मन में कुछ नहीं था...न कोई छवि न कोई सोच... या शायद मैं अपने आप से झूठ बोल कर इन्हें बना रहा था...बन जाने के बाद,एक तुम थी और एक मैं...तुम चहरे से सब जता रही थी और मैं बस बोलता जा रहा था...खिड़की से बाहर जहाँ तक नज़रें जाती वहाँ तक...तुम सुनती रही और धीरे से कंधे पर ढुल गई ...बातें लंबी हो ने लगी और वक़्त को थोड़ी खलने लगी ...अब तुम धीरे धीरे धुंधली हो गई हो और मैं बस चितरने में लगा हूँ, उन सारी बातें को पुतलों में बिठाने की कोशिश में लगा हूँ... अब मैं फिर से दो पुतले चितरुँगा, बन जाने के बाद, एक तुम निकलोगी...बिना धुंधली हुई सी और एक मैं,तुम्हें बनाता हुआ।
#yashraj
#dhundhli #purani_baat