शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

एक तुम थी


मैंने अपनी उँगलियों पर दो पुतले चितरे...चितरते वक़्त मेरे मन में कुछ नहीं था...न कोई छवि न कोई सोच... या शायद मैं अपने आप से झूठ बोल कर इन्हें बना रहा था...बन जाने के बाद,एक तुम थी और एक मैं...तुम चहरे से सब जता रही थी और मैं बस बोलता जा रहा था...खिड़की से बाहर जहाँ तक नज़रें जाती वहाँ तक...तुम सुनती रही और धीरे से कंधे पर ढुल गई ...बातें लंबी हो ने लगी और वक़्त को थोड़ी खलने लगी ...अब तुम धीरे धीरे धुंधली हो गई हो और मैं बस चितरने में लगा हूँ, उन सारी बातें को पुतलों में बिठाने की कोशिश में लगा हूँ... अब मैं फिर से दो पुतले चितरुँगा, बन जाने के बाद, एक तुम निकलोगी...बिना धुंधली हुई सी और एक मैं,तुम्हें बनाता हुआ।
#yashraj
#dhundhli #purani_baat

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