शाम की चाय
जब तुमने शाम को जगाया
मेरी थकान सी दोपहर हार कर उठ गई...
बिखरी बातों को तुमने समेट कर उकाला...
थोड़ी धीमी थोड़ी तेज़ आंच पर
और ले आई छान कर फिर एक विश्वास
वक्त़ की छन्नी में। मीठी बातों का गिर जाना और फिर चिपचिपा हो जाना, मामूली नहीं।अरसा लगता है। भरोसा लगता है। मेरी लिखी बातें क्या पता समझती हो या नहीं पर इतना आसान नहीं था तुम्हारा ये कहना और मेरा ये सुनना कि उठो चाय ठंडी हो जाएगी।
#चाय_की_चुस्की
#तुम्हारे_हाथ_की
#चकल्लस
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