एक चौखट है...
जिसमें सारा परिवार रहता है...
उसी में एक देहरी है जिसमें बचपन पनपता है...
एक चौखट है...
जिस के हत्ते पे राखी बंधती है, कभी रिश्ता लड़ता है...
जिस की खरोंचों पे लंबाई मपती है
बचपन जवान होता है...
एक चौखट है...
जहाँ स्कूल से आते वक़्त बस्ता अटकता है...
जिसमें हर दोस्त यार आके मिलता है...
एक चौखट है...
जिसके पार संसार दिखता है...
जिसके अंदर महफूस समझता है...
एक चौखट है...
जिसके कोई बाहर जाता है...
जिससे कोई अंदर आता है...
एक चौखट है...
जिसमें सारा परिवार रहता है...
जिसमें एक बुढ़ापा...एक जवानी...एक बचपन
एक छोटा सा संसार दिखता है...
एक चौखट है
जो उखड़ती है तो घर मकान बनता है
एक चौखट है...
जो लगती है तो कमरा बंटता है...
जिसके तले एक कलश
किसीके पांव से छलकता है...
इस से कोई बाहर जा के नहीं आती
तो कभी कोई गए की राह तकता है
एक चौखट है
जहां मातम सिसकता है...
कभी उठावना बैठता है...
तो कभी ठोल बजते है...
कभी संगीत थिरकता है...
एक चौखट है..
जहाँ रंगोली ढ़ूलती है कभी
तो कभी दिया भी जलता है...
ये एक चौखट है...
जिसमें एक परिवार रहता है...
जिसके पार संसार दिखता है...
एक चौखट है…
उसी में एक देहरी है जिसमें बचपन पनपता है...
एक चौखट है...
जिस के हत्ते पे राखी बंधती है, कभी रिश्ता लड़ता है...
जिस की खरोंचों पे लंबाई मपती है
बचपन जवान होता है...
एक चौखट है...
जहाँ स्कूल से आते वक़्त बस्ता अटकता है...
जिसमें हर दोस्त यार आके मिलता है...
एक चौखट है...
जिसके पार संसार दिखता है...
जिसके अंदर महफूस समझता है...
एक चौखट है...
जिसके कोई बाहर जाता है...
जिससे कोई अंदर आता है...
एक चौखट है...
जिसमें सारा परिवार रहता है...
जिसमें एक बुढ़ापा...एक जवानी...एक बचपन
एक छोटा सा संसार दिखता है...
एक चौखट है
जो उखड़ती है तो घर मकान बनता है
एक चौखट है...
जो लगती है तो कमरा बंटता है...
जिसके तले एक कलश
किसीके पांव से छलकता है...
इस से कोई बाहर जा के नहीं आती
तो कभी कोई गए की राह तकता है
एक चौखट है
जहां मातम सिसकता है...
कभी उठावना बैठता है...
तो कभी ठोल बजते है...
कभी संगीत थिरकता है...
एक चौखट है..
जहाँ रंगोली ढ़ूलती है कभी
तो कभी दिया भी जलता है...
ये एक चौखट है...
जिसमें एक परिवार रहता है...
जिसके पार संसार दिखता है...
एक चौखट है…
-यशराज
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